बुधवार, 16 नवंबर 2011

hai ri bidai

यह बात उस समय की है जब में घिरोर नामक कस्बे में पोस्टेड थी .यह क़स्बा up  के शिकोहाबाद के पास है .जहा से छोटी लाइन की ट्रेन चलती थी
आस पास के गाँव के लिए ये ट्रेन यात्रा का सुखी साधन था तो मेरे लिए वह मनोरंजन का भी साधन थी.क्योकि कभी कभी मुझे आस पास के गाँव में भी जाना पड़ता था तो में उसी पसेंजेर से यात्रा करती थी.घिरोर के पास एक और क़स्बा है कौरारा.जो घिरोर जाते आते समय रास्ते में पड़ता था.एक दिन जब ट्रेन कौरारा स्टेशन पर रुकी तो एक व्यक्ति अपनी दुल्हन को विदा  करा कर ले जा रहा था.(गाँव में लडकिया सावन के महीने  में मायके आ जाती है और माह दो माह रह कर जब कोई लिवाने आता है तो वापस जाती है)तो वही दृश्य था.लड़की लम्बा सा घूघट निकाले हुई थी और रो रही थी.आंसू थे या नहीं मालूम नहीं पर रो बहुत जोर से रही थी(ये भी एक प्रथा है शायद)उसको छोड़ने उस लड़की का भाई भी था और भी लोग होंगे.जेसे ही ट्रेन चलने को हुई लड़की और जोर से रोने लगी .मेरा मन द्रवित हो उठा.ट्रेन खिसकने लगी तो वह अपने भाई से चिपट गयी और बहुत जोर जोर से रोने लगी .दृश्य बड़ा ही भारी था.मेने सोचा की अरे अगर और रहना चाहती है तो रह लेने देते.शायद ससुराल वाले दुखी रखते होंगे.सभी यात्रिओ  की सहानुभूति उस लड़की के साथ और जमाई राजा कसी.इधर लड़की भाई को छोड़ने को तैयार नहीं एक बार लगा की कही भाई ट्रेन के साथ ही न घिसटने लगे सो जबरदस्ती भाई का गला लड़की की बाहों से मुक्त कराया.में बहुत दुखी थी और सोच रही थी की जरूर पूछोगी की बहन तुझे क्या कष्ट है.जेसे ही ट्रेन स्टेशन को पार कर गयी लड़की ने झट से अपना घूघट उठाया और जमाई राजा के कंधे पे हाथ मार कर बोली" काहे कल चो नाही लिवावे आये.ट्रेन के डिब्बे में एक हसी का फब्बारा छूट गया और में तो हतप्रभ हो कर बस इतना ही कह पायी "हाय  रे बिदाई"

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